किरदार पे काफी धूल जम गई है
किरदार पे काफी धूल जम गई है, जनाब,
सच कहीं दब गया है नीचे,
फँस गया है झूठों और छलावों के बोझ के तले,
उन मुखौटों के नीचे
जिन्हें हमने सच मान लिया है अपना
असलियत सारे दावों की जाँचे-परखे बिना।
बस दायरे जानते हैं, शर्तों से बनी ज़िन्दगी समझते हैं हम,
जहाँ पूरा आसमान वजूद का इंतज़ार में है
हमें खुद में समाने के लिए।
जैसे राहगीर धूल में ढक जाता है, सन जाता है राह की कीचड़ में,
वैसे ही हम लदे पड़े हैं धूल से।
धूल हटा दीजिये, जनाब,
किरदार का दम घुट रहा है नीचे दबे-दबे,
झूठ के मुखौटों के,
दबे अरमानों और जज़्बातों के।
ज़िन्दगी को साँस लेने का मौका दीजिये,
बहने दीजिये उसे,
बह जाने दीजिये खुदको भी,
तभी खुद का खुदी से मिलना होगा।

